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RUDRAKSHA



                   RUDRAKSHA :  रुद्राक्ष  

रुद्राक्ष वैसे तो सभी देवी देवताओं को प्रिय है लेकिन भगवान शिव को यह सर्वाधिक प्रिय है इसका कारण है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति के हित से वही हैं शाब्दिक व्याख्या से स्पष्ट होता है कि इसकी उत्पत्ति भगवान शिव के अक्षरों से हुई है रूद्र अर्थात शिव और अक्सर था धांसू कहना का भाव है कि शिव के आंसू रुद्राक्ष हैं जो कालक्रम के अनुसार फल रूप में उत्पन्न हुए हैं इस संदर्भ में शिव पुराण की विदेश्वर संगीता के 25 वें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि एक बार माता पार्वती की जिज्ञासा को शांत करते हुए भगवान से उन्होंने बताया कि वह दिव्य सहस्त्र वर्षों तक तपस्या करते रहे थे उन्हें और उनके नेत्रों से आंसू निकल पड़े उन्हीं अश्रुओं से रुद्राक्ष के वृक्ष पैदा हो गए।। कहा गया है :

                               पुटभ्यां चारू चक्षुभ्यां पतिता जलविंदवः ।
                            तत्राक्षुविंदो   जाता वृक्षारुद्राक्ष संज्ञकाः ॥ 

रुद्राक्ष का वृक्ष अमरूद के वृक्ष के समान होता है , जिस पर तीन से छह इंच तक लंबे पत्ते तथा गोलाकार नीले रंग के आधे से एक इंच तक के फल लगते हैं जो स्वाद में मीठे , कसैले या खट्टे होते हैं । वृक्ष पर फल मार्गशीष मास के प्रारंभ में या कार्तिक मास के अंत में लगते हैं । फल पर एक आवरण होता है जिसे हटा देने पर रुद्राक्ष निकल आता है । यह आवरण तभी हटाया जा सकता है जब यह फल सूख जाता है । इसको सूखने में ही 8 - 10 माह लग जाते हैं । शुरू में ये हरे होते हैं । इनमें एक से इक्कीस तक धारियां बनी होती हैं जिन्हें मुख कहते हैं । ये आयताकार , गोल , अंडाकृति के होते हैं ।
 रुद्राक्ष ही एक ऐसा फल है जिसे धारण किया जाता है । कई बार रुद्राक्ष जुड़वां भी उत्पन्न होते हैं , जिन्हें शिव - पार्वती का प्रतीक यानी गौरीशंकर माना जाता है । इसी तरह तीन रुद्राक्ष जुड़वां हों तो उसे त्रिजुगी या शिव - पार्वती - गणेश अथवा ब्रह्मा - विष्णु - महेश का प्रतीक माना जाता है । लेकिन ऐसे रुद्राक्ष बहुत कम देखने में आते हैं और कई वर्षों में यदा - कदा ही उत्पन्न होते हैं ।
 रुद्राक्ष को हिंदी , बंगला , संस्कृत , भोजपुरी , गुजराती , पंजाबी में रुद्राक्ष ' , तमिल , कन्नड़ , तेलुगू में ' रुद्राक्ष कोटि ' , आंग्ल ( अंग्रेजी ) भाषा में Utrasum Bead  तथा लैटिन भाषा में Elaeocarpus Ganitrus Roxb   कहते हैं ।
 पर सदाक्ष भारत में खासकर हिमालय के आंचलिक भागों में ही क्षेत्र नेपाल है , जहां एकमुखी रुद्राक्षों पर पाया जाता है । सर्वाधिक उत्पादक क्षेत्र नेपाल है , जहां एकमाली राजपरिवार का आधिपत्य है । यह रुद्राक्ष राजकोष में जमा किया जाता कोई व्यक्ति एकमुखी रुद्राक्ष का व्यापार करता है तो वह दंड का भागी पार जाता है । नेपाल के भोजपुर जिले ( जो बिहार की सीमा से जुड़ा है । रुद्राक्षकी अधिक पैदावार होती है । इसके अलावा तिब्बत , इंडोनेशिया , सुमात्रा , चीन जावा , मलेशिया , मेडागास्कर , पैसिफिक आइलैंड में भी रुद्राक्ष की पैदावार होती है । नेपाल में बेर के आकार का और मलेशिया में मटर के आकार का रुद्राक्ष बहुतायत से पाया जाता है । बिना धारी का बड़ा रुद्राक्ष जावा से आयात किया जाता है । आजकल पाश्चात्य देशों में रुद्राक्षों की काफी मांग है । अत : भारत से इनका गुप्त रूप से निर्यात भी किया जाता है । क्योंकि अनेक अच्छे किस्म के रुद्राक्षों की वहां मुंहमांगी कीमत आसानी से मिल जाती है । शिवपुराण में रुद्राक्ष प्राप्ति के स्थानों का विवरण इस प्रकार दिया गया है।
                                भूमौगोडोभ्दवांश्चक्रे        रुद्राक्षाञ्छिववल्लभान । 
                मथुरायामयोध्यायालंकायांमलयेतथा । 
सह्यद्रौचतथा              काश्यादेशेएवषुन्येवातथा ।
                  परानसापापौघभेदनांछुतिनोदानान् ॥
 अर्थात् शिव के प्रिय स्थानों गौड़देश , मथुरा , अयोध्या , लंका , मलयाचल सह्यपर्वत , काशी व अन्य पापनाशक स्थलों पर रुद्राक्ष पाए जाते हैं ।

शाब्दिक विवेचन 

शब्दकोशों में रुद्राक्ष शब्द को अनेक भावार्थों में विवेचित किया गया है । कुछ का यहां उल्लेख किया जा रहा है । सामान्यत : रुद्राक्ष को भगवान रुद्र के अश्रुओं से उत्पन्न एक प्रकार का कसैला , खारा फल माना जाता है । शब्दकोषों के अनुसार रुद्र शब्द ' रुत् ' से बना है , जिसका अर्थ है - ज्ञान की प्राप्ति । इसी तरह रुज से रुद्र शब्द की उत्पत्ति हुई है । रुज का अर्थ है - जो सभी प्रकार के कष्टों को दूर करे । एक अन्य विवेचन इस प्रकार है - रोदयति इति रुद्रः अर्थात जो दुर्जनी के लिए पीडाकारक है ।